चित्र

विकचित्र एक विचित्र,
कुछ विचार पूरित कुछ स्वयं अंकित,
कई बार कुछ बनाने को, अपनी कूची उठाने को,
हाथ उठते हैं थम जाते हैं, ये सोच कर,
की आग की लपटों से चित्र बनाने से,
और अंगारों की कुचियाँ चलाने से,
कही पन्नो की क्षमता ह्रास न हो जाये,
उनमें प्रकाश समाहित जो होता है,
उसके परिवर्तन से पन्नों पर
कही मैं कुछ ज्वलंत न बना डालू,
कही कुछ मुझ से जल न जाये,
अलग अलग रंगों की लपटों को
अलग अलग कुचियों से लपेट
जब पन्नो पर बनती रेखाएं
एक आकार जलाती हैं,
कई आनंद हृदय से दूर,
किसी अनंत अँधियारे में
अकुलाती सी
स्वास पूरी करने का प्रयास करती
जब स्वर्गीय होती हैं,
कुछ फिर जल उठता है,
कुछ और उकेरने को
फिर कुचियाँ उठाता है।
और फिर कुछ पन्ने जलने को पीड़ित होते हैं।।

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