संदेश

चित्र

विकचित्र एक विचित्र,
कुछ विचार पूरित कुछ स्वयं अंकित,
कई बार कुछ बनाने को, अपनी कूची उठाने को,
हाथ उठते हैं थम जाते हैं, ये सोच कर,
की आग की लपटों से चित्र बनाने से,
और अंगारों की कुचियाँ चलाने से,
कही पन्नो की क्षमता ह्रास न हो जाये,
उनमें प्रकाश समाहित जो होता है,
उसके परिवर्तन से पन्नों पर
कही मैं कुछ ज्वलंत न बना डालू,
कही कुछ मुझ से जल न जाये,
अलग अलग रंगों की लपटों को
अलग अलग कुचियों से लपेट
जब पन्नो पर बनती रेखाएं
एक आकार जलाती हैं,
कई आनंद हृदय से दूर,
किसी अनंत अँधियारे में
अकुलाती सी
स्वास पूरी करने का प्रयास करती
जब स्वर्गीय होती हैं,
कुछ फिर जल उठता है,
कुछ और उकेरने को
फिर कुचियाँ उठाता है।
और फिर कुछ पन्ने जलने को पीड़ित होते हैं।।
जब घोर घनी दुख की बदली छाती है,
तुम मन बांध के धैर्य से किसी वृक्ष तले,
वर्षा थमने का इंतज़ार करो।
नही होता है कुछ भी झटके से,
तुम अपने को नियंत्रित रखो।
जब डूबती है नौका तब
घबराने से कुछ होता नही,
तुम धैर्य को नौका बना के,
धीरे धीरे समंदर पार करो।।
बहुत कठिनाइयों से मिलता है जीवन,
कठिनाइयों से लड़ आगे बढ़ो।।।
क्या करूँ अब समझ आता नही,
दायरा सोच का अब गहराता नही,
किस मोड़ पर छोड़ा है अब मेरी गलतियों ने,
सुधारने का रास्ता नज़र आता नही,
किसी की खुशियों और दुख का कोई अंत तो हो,
इसका अब जवाब मिल पाता नही,
तुम्हे मेरी गलतियों की सजा न मिले,
इतना भी में खुद से कह पाता नही,
तेरी बददुवाएं भी मैं स्वीकार करता हूँ,
की मेरा खुशियों से कोई वास्ता नही।।

A Gift

चित्र
में मेरे भीतर का उन्माद लिए घूमता हूँ,
अकेला हूँ मैं कई स्वपन बर्बाद लिए घूमता हूँ,
जब चमक के विचार का एक व्यवहार से पाता हूँ,
आज मैं व्यवहार का वो स्वाद लिए घूमता हूँ,
अकेले ही दिल के कई ख़यालात लिए घूमता हूँ,

song of my short film

पिंड दान

कितना छुपूं, इन अलमारियों के पीछे के अंधेरों में, थक जाता हूँ जब शाम होती है,
सलाह के बाजुओं पर जब मैं कंधे रखता हूँ, चिरमिराती महँगाइयों से आंखें भर आती हैं,
मैं छिपे नज़रों से उनका बदन नोंचता हूँ,
इस उम्मीद में कई सौ के नोट का कलर कभी गहरा हो, उसकी बंडलों जितना,
और उसके रंगों का मोटापन मेरे आशाओं के पतले चादर के ऊपर थोड़ा सा फैले,
ताकि मेरे गरीबी में ठंड से सुलगते बदन को,
थोड़ी की गर्मी की राहत मिले,
सन्नाटे की चीरती आवाज़ उसके गले मे फंस जाती है कभी कभी,
शायद मेरे मजबूरी के चीखने से थोड़ा सहम जाती है,
मैं लिखता हूँ पढता हूँ कई पन्ने अपने लिखी कहानियों के,
फिर फाड़ के फेंक डालता हूँ,
क्यों कि हुनर अब पैसो तले दबा सा दिखता है,
जब मैं पन्नो के ओट में से अलमारी के नीचे छुपे अंधेरे में बातों का दीपक जला रौशनी करता हूँ,
शायद अब बातों का बनाना और खुले का नहाना दोनों करना होगा,
चन्द लोग घूरेंगे, मेरे फटते कपड़े और चरमराई सी देह पर तरस खाते,
पर विचारों की कमजोरी का उससे क्या लेना देना,
बस उस अलमारी के अंधेरे कोने में डरा सा दुबका सा मैं,
अपने अंतिम संस्कार के लिए अपनी अस्थियां त्याग रहा होऊंगा,
अ…